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संगत मे रंगत
 
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आपकी संगति अच्छी होनी चाहिए। क्योंकि आपकी संगति यह निर्धारित करती है कि आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे या नहीं क्योंकि आप कुछ समय तक 6 नालायको के साथ रहे और आप देखेंगे कि एक समय के बाद 7वे नालायक आप होंगे और आप तीन सदाचारी दोस्तों के साथ रहिए और आप पाएंगे कि चौथे जेंटलमैन आप होंगे।
अच्छी संगति सदा सुख दायक होती है। महावीर कर्ण में कई ऐसे गुण थे जो हर किसी मे नही होते वह शूरवीर थे, परशुराम के शिष्य थे और कई अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कौशल में महारत थे किंतु उनकी मृत्यु बड़ी ही दुख दायक तरीके से हुई क्योंकि उन्होंने अधर्म का पक्ष लिया था अर्थात दुर्योधन की बुरी संगति में थे।
जैसे पुष्य नक्षत्र में गिरे हुए जल की बूंदें जब शिप मे गिरती है तो मोती बन जाते हैं,केले के पत्तो पर गिरती है तो कपूर बन जाता है और वही सांप के मुंह में गिरता है तो विष बन जाता है, जल तो वही है किंतु संगति अलग-अलग है आपको भी अच्छी संगत मे रहना चाहिए। जो आपके जीवन का विकास करे।
और अगर आप गलत संगति में हो तो तुरंत अपनी संगति बदल दीजिए जैसे विभीषण को बोध हुआ कि रावण गलत है तो उसने संगति बदल ली और श्री रामचंद्र जी के साथ हो गया चाहे दुनिया उन्हें घर का भेदी कहती हो किंतु उसी के कारण समग्र विश्व का और रावण का कल्याण हुआ।
जीवन मे आगे बढ़िये और सफलता को प्राप्त कीजिए।
अगर आप आज असफल हुए हैं तो चिंता मत करिए क्योंकि जब आप कल सफल होंगे तो आप दो बातें ज्यादा सीखेंगे उन लोगों से जो पहली बार मे सफल हुए थे।
आप मेहनत करें आगे बढ़े और सफलता
प्राप्त करें और आप अवश्य सफल होंगे, जरा सोचिए नेल्सन मंडेला जिस देश कि जेल में रहने के बावजूद उसी देश के राष्ट्रपति बन सकते हैं तो आप भी जीवन में कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं।

 करण कुशवाह

 

शिक्षा त्याग कि भावना होने पर हि सफल है

प्रतिभाशाली लोग भी पतन के मार्ग पर जाते हैं ।
ज्ञानवान जब भटक जाए, बुद्धिमान जब
आचरण से गिर जाये तो तुरंत यह सीख लेनी चाहिए कि ऐसा क्यो होता है।
कई बार पढ़-लिखकर लोग चालबाजी सीख जाते हैं।
चुंकि शिक्षा का उद्देश्य जीवनयापन रह गया है इसीलिए
अपने जीवन को संवारने के लिए दुसरे का
जीवन बिगाड़ना पड़े तो भी लोग तैयार रहते
हैं।
इसीलिए शिक्षा शोषण का माध्यम बन गया है। यदि सेवा और त्याग की वृत्ति चली जाए और शिक्षा
जीवन में आ जाए तो ऐसे लोग प्रतिभावान होने के साथ-साथ घातक भी सिद्ध होंगे। रावण प्रतिभाशाली था,
लेकिन पुरे समय विध्वंस मे लगा रहता था वह जब श्रीराम के बारे में जानकारी ले रहा था तो उसके दूतों ने एक चिट्ठी सौंपी।
'रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन।
सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
श्रीरामजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे पढ़वाकर छाती ठंडी कीजिए।
रावण ने हंस कर उसे बाएं हाथ से लिया और
मंत्री को बुलवाकर वह मूर्ख उसे पढ़वाने लगा। यह वही पत्र था जो लक्ष्मणजी ने रावण को भेजा था। प्रतिभा को वैराग्य का पत्र पहुंच चुका था।
वैराग्य की घोषणा है कि जहा ईश्वर है, वहीं
प्रतिभा है। बिना ईश्वर के प्रतिभा लूट, हिंसा, ईष्ष्या और षड्यंत्र बन जाएगी। वैराग्य का मतलब है आ जाए तो सहजता से स्वीकार करेंगे और देना पड़े तो असहज नहीं होंगे।
तब आदमी भीतर से शांत हो जाता है। प्रतिभा शांत होकर दर्पण बन जाती है। उसमें खुद को देखकर लिए निर्णय कभी गलत नहीं होंगे।

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