Bal Kahaniya

गीदड का दिखावा मौत का कारण-


jackal


एक बार एक भूखा प्यासा गीदड़ जंगल में भटक रहा था तभी वह किसी गांव में भटकता हुआ पहुंचा गांव में बहुत से आवारा कुत्ते घूम रहे थे। तभी गीदड़ को देखकर कुत्ते भोंकने लगे गीदड़ डर गया और भागते भागते एक धोबी का घर खुला दिखा वह गीदड़ उस घर मे चला गया अंधेरा होने से उसे कुछ स्पष्ट दिखा नही और वो एक नीले रंग के पानी के कुंड मे जा गिरा।

यह नीला रंग का पानी धोबी ने कपड़े रंगने के लिए रखे थे। अब गीदड़ उस नीले रंग में पूरी तरह से रंग गया था और एक विचित्र सा प्राणी लगने लगा था अब वो छिपते छिपाते जंगल में वापस आया। और सभी जानवरों ने उसे देखा और आश्चर्य करने लगे कि यह विचित्र प्राणी कौन है और सभी आपस में चर्चा करने लगे यह प्राणी असाधारण लगता है कोई देवदूत होगा और उन्हीं में से जंगल के राजा शेर ने कहाँ कि आप कोई असाधारण देवदूत लगते हैं अतः आप ही इस जंगल के राजा का पद संभाल सकते हैं और उसे जंगल का राजा बना दिया।

इसके बाद गीदड़ की खूब सेवा की अब गीदड़ का जीवन बहुत सुखमय हो गया था उसे खाने के लिए शिकार करने की आवश्यकता नहीं होती थी जंगल के सभी जानवर अच्छा-अच्छा खाने को लाते और उस गीदड़ को परोस देते एक बार की बात है कि पास के जंगल से कुछ गीदड़ो की भयंकर टोली आई और जंगल के जानवरों पर टूट पड़ी तब जंगल के जानवरों ने उस विचित्र गीदड़ के पास जाकर सहायता मांगी।

खरगोश ने कहा- महाराज आप हमारी रक्षा करें यह सारे गीदड़ हमे मार देगे, और इनकी संख्या भी बहुत ज्यादा है यह हम सब को मार देंगे किंतु किसे पता था कि वह कोई विचित्र देवदूत नहीं वह तो उन्ही में से एक गीदड़ था।
उसने मन ही मन सोचा कि अगर मैंने इन्हें बता दिया कि मैं कौन हूं तो यह लोग मुझे मार देंगे जंगल के सारे प्राणी अपनी जान बचाकर भागने लगे किंतु गीदड़ जो विचित्र था। उसे मजबूरी में उन गीदड़ो कि टोली से लड़ना पड़ा और लड़ते हुए उस पर गीदड़ो की टोली ने भयानक आक्रमण कर उसके टुकड़े टुकड़े कर डाले।

Moral- :अर्थात शिक्षा यह मिलती है कि जो वास्तविकता है उसे अपनाना चाहिए,अपनी वास्तविकता में ही खुश रहना चाहिए। किसी प्रकार का ढोंग या आडंबर करने की आवश्यकता नहीं है अन्यथा कभी न कभी सच अवश्य सामने आयेगा और आप उस सच से बचकर भाग नही पाओगे और गीदड़ कि तरह लपेटे जाओगे।आप जो हो उसे स्वीकार करो। आपको दिखावा करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि दिखावा ही दुख का कारण है।


 

लोभ ही नाश का कारण है

 

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एक बार सारे देश में वर्षा ना होने के कारण सूखा पड़ गया सूखे के कारण फसलें नष्ट हो गई लोग भूख प्यार से मरने लगे पक्षी बेचारे भूख से तड़पने लगे तो उन्होंने सोचा कि अब पहाड़ों की ओर ही चलना चाहिए|

 पहाड़ों की ओर जाने वाले पक्षियों में चिड़ियों का भी एक दल था यह दल दिन भर की उड़ान के पश्चात एक पहाड़ की चोटी पर पहुंचे तो उन्हें वहां पर भी खाने के लिए नहीं मिला जो थोड़ी-बहुत इधर उधर भाग दौड़ से मिला भी उससे उसका पेट नहीं भर पाया |
इस दल में एक चिड़िया बहुत होशियार थी उसे जब भूख से अधिक तंग किया तो वह अकेले ही जंगल की ओर निकल गए इस जंगल में से एक बड़ी सड़क शहर की ओर जाती थी उस चिड़िया ने देखा कि इस सड़क पर से अनाज से भरी गाड़ियां शहर की ओर जा रही थी इन गाड़ियों में से थोड़ा बहुत अनाज इस सड़क पर गिरा जा रहा था चिड़िया ने अनाज को गिरते देखा तो उसका मन खुशी से नाच उठा भूखे को रोटी मिलने की आशा हो तो वह खुश हो जाता है, यही हाल उस चिड़िया का था जिसका पूरा दल एक-एक दाने को तरस रहा था पहले तो उसके मन में आया कि मैं अपने दूसरे साथियों को भी इस बारे में बता दू किन्तु फिर वह स्वयं ही,

बोली - नहीं नहीं अब वह अकेली इस जीवन का आनंद लेंगी किसी को भी वह नहीं बताएगी कि वहां पर इतना अनाज पड़ा है दिनभर उस अनाज को खाकर आनंद लेती रही।

जब रात को अपने दल में वापस गई तो उसके साथी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे चिड़िया को देखकर सभी खुश हो गए फिर उन्होने पूछा कि तुम अकेली कहां गई थी।

चिड़िया ने कहा- यू ही बस घूमने निकल गई थी।

चिड़ियो के राजा ने कहा- लगता है तुम हमसे कुछ छुपा रही हो।

चिडिया - नहीं तो मैंने यहाँ अपने दल वालों से क्या छुपाना है।

चिड़ियाराजा- देखो बहन अपने साथियों से चोरी करना सबसे बड़ा पाप है।

चिड़िया- यदि तुम लोग सुनना चाहते हो तो सुनो मैं अपने खाने की तलाश में जंगल की ओर गई थी।

चिड़ियाराज- तो फिर कुछ मिला तो बहुत कुछ परंतु खाने का हुक्म नहीं हुआ, क्योंकि उस जंगल में शिकारी बहुत घूम रहे हैं फिर वहां पर बाज भी रहते हैं,इसी डर के कारण खाने का अवसर नहीं मिला।

चिड़ियाराज- फिर तो मामला बहुत खराब हो गया है।

सब चिड़िया निराश हो गई थी वह चिड़िया समझ गई थी कि उसका तीर निशाने पर बैठा है। उसने जो बोला था वह सफल रहा। अब वह अकेली ही उस सड़क पर पड़े अनाज को उठा उठाकर इकट्ठा किया और चोरी चोरी अपना भंडार भरने लगी।

उसने सोचा इन भूखे लोगों के साथ रहने का लाभ भी क्या है, लालच हर प्राणी को अंधा कर देता है, यही हाल उस चिड़िया का था अब वह लालच में अंधे होकर अपने ही सगे संबंधियों से अलग हो रही थी और सुबह होते ही वह उसी सड़क के किनारे जाकर बैठ गई जिस पर अनाज की भरी गाड़ियां गुजरने वाली थी।

अनाज की गाड़ियां आगे बढ़ने लगी, चिड़िया भागी सड़क पर पड़े अनाज को उठाने लगी लोभ में अंधी चिड़िया ने यह भी न देखा कि जिस सड़क पर से वह दाने उठा रही है उसके पीछे ओर भी बेल गाड़ियां आ रही है।

वो दाने उठा उठाकर पहाड़ी की गुफा में इकट्ठा करती रही वह लोभ में अंधी हो चुकी थी।

उसने सड़क पर बहुत से अनाज के दाने बिखरे देखे तो उसका लोभ और भी बढ़ गया।

वो जल्दी से जल्दी इन दानों को उठा उठा कर गुफा में पहुंचाने लगी तभी पीछे से आ रही बेल गाड़ियां उसके सिर पर आ गई थी।
तभी उसे यह पता चला कि वह उसके नीचे आकर मर सकती थी, उसका ध्यान तो उन दानों की ओर था वह अधिक से अधिक अनाज इकट्ठा करके अमीर बनना चाहती थी कुछ गाड़ीवान तो दयालु भी थे उनके मन में दया थी उन्होंने उस चिड़िया को बचा लिया।

परंतु एक गाड़ीवान नींद में उग रहा था उसने सड़क की ओर देखा भी नहीं , चिड़िया भी अपने मजे से दाने इकट्ठे करने में लग रही थी। तभी गाड़ी चलती हुई चिड़िया के ऊपर चढ़ गई और वह बेल के पांव के नीचे आकर कुचली गई। जब वह चिड़िया शाम को वापस नहीं लौटी तो उसके दल के राजा को बहुत चिंता हो सुबह होते ही वह सब लोग उसकी खोज में निकले तो उन्होंने सड़क पर उस चिड़िया का कुचला हुआ शरीर देखा पास ही बहुत सा अनाज बिखरा पड़ा था।
चिड़ियाराज- यह क्या यह तो हमें कहती थी कि उधर शिकारी और बाज बहुत है फिर खाने को भी कोई अधिक नहीं चिड़िया के राजा ने ठंडी आह भरते हुए कहा कि लालच बहुत बुरी बला है मित्रों ।

Moral-:   लालच का परिणाम वास्तव में प्राणी को अंधा कर देता और मौत का कारण बनती है ।

 



गधे कि मूर्खता


donkey
बनारस में कर्पूरपटक नाम का एक धोबी रहता था। उसके पास एक गधा था, जो उसके काम में हाथ बटाता था। इसके अतिरिक एक कुत्ता भी था जो दिन के वक्त घाट पर कपड़ों की और रात के समय घर की रखवाली करता था।
एक रात धोबी और उसकी पत्नि बेफिक्री से सो रहे थे कि। 'आधी रात को घर में एक चोर घुस आया। उस समय धोबी का कुत्ता और गधा दोनों ही आँगन में बँधे हुए थे। गधे ने जैसे ही चोर को देखा तो वह झट से कुत्ते से
बोला- ‘देखो मित्र..चोर.. मालिक के घर में चोर घुस रहा है।' ‘तो फिर मैं क्या करू?

गधा- ‘अरे मूर्ख, तुम जोर-जोर से भौंक कर मालिक को जगाओ ताकि मालिक चोर से अपनी संपत्ति की रक्षा कर सके।' गधे ने क्रधित होकर कहा।

कुत्ता- ‘गधे भैया।? तुम मेरे काम की चिंता मत करो'।

बिना वजह दूसरे के काम में दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए।

कुत्ता- क्या तुम यह नहीं जानते कि मेरे द्वारा रात-दिन मालिक के घर की रक्षा करने के बाद भी हमारा मालिक मेरी सेवा का कोई अहसान नहीं मानता है।

अब तो इसने मुझे समय पर खाना तक देना बंद कर दिया है, मैंने तो यह फैसला कर लिया है कि जब तक इसका नुकसान नहीं होगा, तब तक में भी कुछ करने वाला नहीं हैँ।'

कुत्ते की बात सुन गधा चिढंकर बोला- अरे ओं नमकहराम। सुन, काम पड़ने पर जो सेवक अपनी माँगे स्वामी के आगे रख देता है, उसे वफादार सेवक नहीं कहा जा सकता। मालिक पर संकट आने को है और ऐसे में तु अपना नफा-नुकसान और मान-सम्मान कि बात सोच रहा है?

कुत्ता- ‘जो मालिक काम पड़ने पर ही नौकरों से बात करे तथा उसकी जरूरत समझे, वह स्वामी भी अच्छा नहीं होता।क्योंकि अपने नौकरों के दुःख-सुख का खयाल रखना स्वामी का ही कर्तव्य होता है, किन्तु हमारा तो मालिक ही निराला है, जब अपना स्वार्थ होता है तो दूध-मलाई खिलाता है और जब मतलब सध जाता है तो सुखी रोटी खिलाना भी उसे बुरा लगता है।'

कुते की बात सुनकर गधे को क्रोध आ गया। वह अपनी आँखें लाल करता हुआ बोला-' ओं मन के खोटे, तुम पापी हो। विद्वानों का मत है कि जो संकट के समय अपने स्वामी के काम न आए, ‘उससे बड़ा दुष्ट इस दुनिया में और कौन होगा। तुम भले ही आज मालिक से नमकहरामी कर लो, किन्तु मैं तो मालिक का नुकसान होते नहीं देख सकता, इसलिए मैं ही स्वामी को जगाने का प्रयास करता हूँ।

बस फिर क्या था। उसी समय गधे ने जोर-जोर से रेंकना शुरू कर दिया। परंतु कहाँ कुत्ता और कहाँ गधा। चोर तो भाग गया, परन्तु उसकी तीखी और बेसुरी आवाज को सुनकर धोबी की नींद खराब हो गई।
उसे बहुत क्रोध आया। वह डंडा लेकर गधे को गालियाँ देता हुआ उस पर टूट पड़ा। क्रोध से भरे धोबी ने बिना कुछ सोचे-समझे गधे को मारना शुरू कर दिया। उसने क्रोध में गधे को इतना मारा कि मार-भार कर उसे अधमरा कर दिया।
Moral-: इसीलिए कहा जाता है कि कोई भी काम को बिना सोचे-विचारे और जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। दूसरों के अधिकार क्षेत्र में व्यर्थ दखल नहीं देना चाहिए। 



लोभी पंडित जी 


pandit

 प्राचीन मगध के किसी गांव में एक ज्ञानी पंडित रहते थे। वे भागवत कथा सुनाते थे। गांव में उनका बड़ा सम्मान था।
लोग महत्वपूर्ण विषयों पर उनसे ही विचार-विमर्श कर मार्गदर्शन लेते थे। एक बार पंडित जी को राजधानी से राज्य के मंत्री का बुलावा आया।

पंडित जी गांव की नदी नाव से पार कर राजधानी पहुँचे। मंत्री ने उनका अतिथि सत्कार कर कहा-'मैंने आपकी ज्ञान की काफी प्रशंसा सुनी है। मैं चाहता हूँ कि आप प्रतिदिन यहाँ आएं और मुझे तथा मेरे परिजनो को कुछ दिन भागवत कथा सुनाएे।

पंडित जी ने खुशी-खुशी स्वीकृति दे दी। अब पंडित जी प्रतिदिन नदी पार कर मंत्री को भागवत कथा सुनाने जाने लगे। एक दिन जब पंडित जी नदी पार कर रहे थे तो एक घडियाल ने पानी से सिर बाहर निकालकर कहा पंडित जी। आते-जाते मुझे भी भागवत कथा सुना दिया कीजिए मैं आपको मोटी दक्षिणा दुगा।
 
यह कहकर उसने अपने मुँह से एक हीरों का हार निकालकर पंडित को दिया।

पंडित जी हार देखकर भूल ही गए की उनको मंत्री के यहाँ कथा सुनाने जाना है। तब से वे रोज उस घाडियाल को कथा सुनाते और वह घड़ियाल रोज उन्हें हीरे मोती देता।

एक दिन नाव चलाने वाला नाविक उन्हें देखकर हँस पडा। पंडित जी ने हँसने का कारण पूछा, तो वह बोला- 'में इसलिए हँस रहा हुँ कि क्या आपने इतने शास्त्रो का ज्ञान सिर्फ एक घड़ियाल को उपदेश देने के लिए लिया है? आपके ऐसे ज्ञान की परिणति देख मुझे हँसी आ गई।

पंडित जी को अपने लोभी स्वभाव पर शर्म आ गई और फिर वे कभी घडियाल को कथा सुनाने नहीं गए।

Moral-: लोभवृति, ज्ञान की गरिमा को खंडित कर ज्ञानी की प्रतिष्ठा समाप्त कर देती है। 



सच्चा शिष्य
 
teacherhappy

गाँव से बहुत दूर एक जंगल में एक गुरूजी रहते थे। वहां उनका बड़ा आश्रम था जहां रहकर अनेक शिष्य विद्याध्ययन करते थे। गुरूजी की वाणी से सभी वेद, शास्त्रो का श्रवण कर ग्रहण भी करते थे।

आश्रम में कई दुधारू गाएं भी थी। जब अध्ययन की अवधि समाप्त हो गई तो गुरूजी ने एक दिन सबको अपने सामने एक साथ बैठाकर दीक्षा और आर्शीवाद देते हुए

कहा- ‘'तुम सब मेरे प्रिय और आत्मीय हो। में चाहता हुँ कि मेरी ओर से भेंटस्वरूप एक-एक गाय अपने-अपने घर ले जाओ शिष्य के रूप में तूमने जो सेवा-भाव दिखाया है, उससे मे बहुत प्रसन्न हुँ।" यह सुनते ही शिष्यगण
गदगद हो गये। वे शीघ्र ही अपनी पसंद की गाय चुन-चुनकर रस्सी हाथ में थामे हुए जब वहा से प्रस्थान करने को उत्सुक हुए तो गुरूजी की दृष्टि एक भोले-भाले शिष्य पर पड़ी जो यह सब चूपचाप देख रहा था।

उसको पास बुलाकर गुरूजी ने पूछा- "बेटा। तुम क्यों शांत खड़े हो ? क्या तुम्हे नही चाहिए' नहीं गुरूजी, वह हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोला-"मुझे यहाँ की कोई गाय नहीं चाहिए।

मुझे केवल आर्शीवाद चाहिए जो आपने देकर मेरा उपकार किया है।" शिष्य की कृतज्ञता भरी वाणी सुनते ही गुरुजी भाव विभोर हो गये। उन्होंने शिष्य के सिर पर हाथ फेरते हुए। कहा-" अब आश्रम की शेष सारी गाये में तुम्हे प्रदान करता हुँ"।

मै आप जैसे गुरु और आश्रम को छोड़कर कहीं भी नहीं जाऊंगा, यहीं आपकी सेवा करूगा। ऐसा कह शिष्य ने ज्यों ही अपना मस्तक गुरूजी के चरणों पर रखना चाहा त्यों ही उन्होंने लपककर शिष्य को अपनी छाती से लगा लिया उस समय सभी शिष्य एक दूसरे का मुंह देख रहे थे।

कटनी (म.प्र.) राजाचौसिया


सियार कि चतुराई
 
siyar
ब्रह्रारण्य नामक वन में कर्पर तिलक नाम का एक हाथी रहता था। वह बडा ही विशाल और बलशाली था। वह जिधर से भी गुजर जाता, वहाँ के पशु-पक्षी अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर छिप जाते।

उसने अनेक पशु-पक्षियों को उन्मत्त होकर अपने पैरों तले रौंद डाला था।

सभी पशु उस हाथी से बचने का उपाय सोचा करते थे। मगर कोई भी ऐसा उपाय उन्हें नहीं सूझा, जिससे हाथी को मौत के मुह में झोंका जा सके। लेकिन उस हाथी से आतंकित एक वृध्द सियार ने ऐसा कर दिखाया। हुआ यह कि डरपोक सियारों ने हाथी से बचने के लिए आपस में विचार-विमर्श किया।

सभी ने कोई-न-कोई उपाय प्रस्तुत किया, मगर कोई भी उपाय कारगर नहीं था। इस पर एक वृद्ध सियार ने
कहा- भाइयों। आपके उपाय स्वयं के लिए घातक हैं, इसलिए उन पर अमल नहीं किया जा सकता। लेकिन मैं प्रतिज्ञा करता हु कि उस हाथी को यमलोक भेजकर ही दम लुँगा।' ‘लेकिन कैसे? क्या एक वृध्द सियार बलशाली हाथी को मार सकता है?' सभी सियारों ने एक स्वर में पूछा।

‘हाँ मार सकता है, अपने विवेक और बुध्दि
से। याद रखो कि कोई भी कार्य ऐसा नहीं है जो असंभव हो। हालाकि मेरे उपाय में भी प्राण जाने की संभावना है, लेकिन मैं वृद्ध हुँ।

अगर अपने बंधु बांधवों को बचाने में मेरी जान चली भी गई़ तो कोई बात नहीं। मेरे इस कार्य से सियार वंश पर लगा बुजदिल, कायर और डरपोक 'नाम का धब्बा मिट जाएगा। मैं उस हाथी को परास्त करके इतिहास बदल दूँगा।

मैं सिद्ध कर दूँगा कि सियार बुजदिल और डरपोक नहीं होते, समय पड़ने पर वे हाथी जैसे भयानक और विशाल पशु को भी परास्त कर देते हैं।

आप लोगों से मैं सिर्फ यही चाहता हूँ कि मेरा उत्साहवर्धन करते रहें।

ठीक है। यदि आप हाथी को मारने में सफल हो गए तो हम लोग आपको अपना सरदार मान लेंगे।' अगले दिन वह वृद्ध और बुद्धिमान सियार हाथी के निवास स्थान पर पहुँचा और सादर प्रणाम करते हुए बोला- श्री कर्पूर तिलक की जय हो। मैं समस्त पशुओं का प्रतिनिधि बनकर आपके समक्ष कुछ कहने के लिए उपस्थित हुआ हूँ।'
‘कहो, निःसंकोच होकर बोलो।'-हाथी ने नम्रता दर्शाई।

सियार- ‘इस वन के सभी पशु-पक्षियों ने एक सभा का आयोजन करके यह प्रस्ताव पारित किया है कि ब्रह्यारण्य का सम्राट आपको बना दिया जाए।

वर्तमान सम्राट शेर सिंह अब अपना कार्यभार ठीक से नहीं निपटा पाते, इसलिए उनको सम्राट के पद से हटाकर आपको सम्राट मनोनीत किया गया है, क्योंकि शेरसिंह के बाद आप ही इस वन के सम्राट बनने योग्य हैं। आप में वे सभी गुण विद्यमान है, जो एक सम्राट में होने चाहिए। अतएव वन्य-पशुओं का प्रस्ताव स्वीकार कर सम्राट का पद ग्रहण करें। इस उपलक्ष्य में हमने एक भव्य समारोह का आयोजन किया है।

कृपया वहाँ उपस्थित होने की कृपा करें। शुभ मुहुर्त आरंभ होने वाला है। वृद्ध सियार की बात सुनकर हाथी हर्षित हो उठा। वह बुध्दिविवेक को परे रख सियार की चाल में फँस गया था।

सम्राट बनने की लालसा में वह अंधा हो गया था। उसे अपने भाग्य पर अभिमान हो रहा था कि शेरसिंह को गद्दी से हटाकर उसे सम्राट बनाया जा रहा है।

वह तत्काल सियार के साथ चल पडा। हाथी और सियार दोनों मजे से चले जा रहे थे।सियार उसे उस रास्ते से ले जा रहा था, जहाँ पर आगे बहुत बड़ी दलदल थी।

हाथी तो सत्ता के मद में चूर था, अतः उसने भूमि के समतल या दलदली होने पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। जब उसके पैर दलदल में पड़े तो धँसते ही चले गए। उसने दलदल से निकलने की बहुत कोशिश की, मगर निकल नहीं पाया।

हाथी ने सियार से कहा-मित्र। मुझे बचाओ। मैं दलदल में धँसता जा रहा हूँ।

वृद्ध सियार ने कहा-'तुमने अपनी बुध्दि और विवेक से काम नहीं लिया।सियार जैसे धुर्त और चालाक पशु की बात पर विश्वास कर लिया, अब उसी का फल भोगो।' इस प्रकार वह उन्मत्त हाथी उस दुलदल में धँसकर काल के गाल में समा गया। इस प्रकार सियारों तथा अन्य पशुओं को उस दुष्ठ हाथी के आतंक से मुक्ति मिल गई।

Moral-: बड़ा शरीर होने से कोई शक्तिशाली नही होता ।
बल्कि चतुर बुध्दि से शक्तिशाली होता है। दुसरो पर अत्याचार करने वाले, व्यक्तियो की अंतिम दशा ऐसी हि होती है।आज नही तो कल उन्हे मौत के मुँह मे जाना हि पड़ता है।


आगे हि आगे बढो
 
teacherhappyशाम का समय था गुरुजी ने मधुकांत को जंगल से लकड़ियां लाने के लिए भेजा। ज्यो ही मधुकांत जाने लगा, सामने देखा तो एक विशालकाय राक्षसी छाया दिखाई दी।

मधुकांत डरकर वापिस दौड़ा- "गुरु जी। बाहर आश्रम की दीवार पर एक राक्षस है।" गुरुजी शांत होकर बोले- "तो क्या हुआ...तुम उस राक्षस से भिड़ जाओ..." "लेकिन वह तो मुझसे पांच गुना अधिक लम्बा चौड़ा है....' "‘तब क्या है? यह मेरी आज्ञा है। प्रभु का नाम् जपता हुआ मधुकांत धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ने लगा। लेकिन यह क्या।

आश्चर्य। राक्षस छोटा होने लगा। मधुकांत और आगे बढ़ा, राक्षस और छोटा हो गया। आखिर में दीवार के पास पहुंचने पर राक्षस मधुकांत के बराबर कद का रह गया।

पीछे से गुरुजी की हंसने की आवाज आई। मधुकांत झेंप गया, "गुरुजी बस और शार्मिन्दा ना करें। मैं जान चुका हूँ कि यह तो मेरी परछाई थी।'

"लेकिन बेटा, यह भी जान लो कि सभी कठिनाईयां एक छाया से अधिक कुछ नहीं होती। दृढ़ता से आगे बढने से कठिनाईयां छोटी होती जाती हैं। 


अक्ल बड़ी या भैंस

buffalo
 बुद्धिराम तथा पगला राम दो भाई थे। इनमें से बुद्धिराम बड़ा भाई था जो थोड़ा बहुत पढ़ा-लिखा था। छोटा भाई संस्कृत ही जानता था।
इस पर भी उसके पास बुध्दि नाम की कोई चीज़ नहीं थी। मोटी अक्ल का होने के कारण जो भी बात उससे कही जाती वह उसे मान लेता।
दोनों भाईयों में प्रेम तो बहुत था। बड़े भाई की शादी हो चुकी थी लेकिन उसका गौना होना शेष रह गया था।
यह भी एक विचित्र बात थी कि गौना जिस दिन लेने के लिए वे जाने वाला था, उस दिन बुद्धिराम के कारोबार के विषय में बहुत ज़रूरी काम से जाना पड़ था, धन का लोभ कभी-कभी इन्सान' को मजबुर कर देता है।
यही हाल हुआ था बुद्धिराम का। एक ओर गौना, दूसरी ओर हज़ारों रुपए का लाभ। अब इन दोनों में से किसे छोड़े ? यही सोचकर बुद्धिराम ने अपनी बुद्धि पर जोर डाला और अंत में वह इस निर्णय पर पहुँचा कि-" गौना तो उसका भाई भी ला सकता है, इसलिए अच्छा यही होगा
पगलाराम को गौना लेने के लिए भेज दिया जाए और वह स्वयं धन कमाने। इस प्रकार से ‘एक पंथ दो काज’ हो जाएगे।"
यही फैसला करके बुद्धि राम ने अपने छोटे भाई पगला राम को पास बुलाया और अपनी सारी योजना उसे बताते हुए कहा-" देख भाई पगला राम। आप मेरे ससुराल जाकर गौना लाने का काम पूरा करे।
में उस व्यापारी से धन कमा कर लाता हुँ। परन्तु इस बात का ध्यान रहे कि ससुराल वालों के घर जाकर अधिक बोलना अच्छा नहीं होता। जैसे ही तुमसे कोई प्रश्न करे तो बस हाँ या नहीं में उत्तर देना। ‘‘ठीक है भैया। जैसे आपकी आज्ञा होगी वेसा ही काम मैं करूंगा।
हाँ और नहीं से अधिक और कुछ नहीं कहूँगा।’ यह कहकर पगलाराम वहाँ से उठ खड़ा हुआ। अब दोनों भाई अपने-अपने काम पर चल पड़े। पगला राम ससुराल जा पहुँचा तो ससुराल के लोगों ने उसे घेर लिया। गाँव के लोग घर आए मेहमान के स्वागत के लिए इकट्ठे हो गए थे और उससे पूछने लगे कि‘'भाई। तुम्हारे गाँव वाले तथा घर के लोग तो कुशलतापूर्वक है?"
पगलाराम को यही आदेश मिला था कि आज आपने हर प्रश्न का उत्तर हाँ और नहीं में ही देना है।
इसलिए उसने झट से कहा-" हा...हा.. सब कुशल है। फिर लोगों ने पूछा- " क्या घर में कोई बीमार है, क्या तुम्हारा भाई बीमार है ?" ‘जी हाँ। पगला राम बोला।
‘क्या उसको दवाई दे रहे हो ?’’ ‘जी नहीं ‘‘क्या अधिक बीमार है ?’’ ‘‘हाँ .... हाँ” पगला राम का यह उत्तर सुनकर सब लोग निराश हो गए।
उन्होंने पगला राम की ओर निराशा भरी दृष्टि डालते हुए फिर पूछ-‘‘क्या उसके बचने की उम्मीद है या नहीं।"
‘‘नहीं।" फिर क्या था, पगलाराम के मुख से यह शब्द सुनकर सब लोग जोर-जोर से रोने लगे। उ्न्हे रोते देखकर पगलाराम भी रोने लगा। पगलाराम को रोते देखकर तो उन्हें इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि- बुद्धिराम बहुत बीमार है, उसके बचने की कोई आशा नही है। सारा दिन इसी तरह रोते पीटते गुजर गया दुसरे
दिन सुबह उठते ही पगलाराम जैसे ही अपनी भाभी को लाने को तैयार हुआ तो लड़की वालों ने उसे
साफ कह दिया कि-" हम तो अपनी लड़की को विदा नहीं कर सकते क्योंकि हमें पता है कि इसका
पति इसके जाने तक जीवित नहीं रहेगा अब तो यह विधवा हो चुकी है।"
यह जवाब सुनकर पगला राम वहाँ से वापस आ गया। जैसे ही अकेला घर वापस आया तो बड़े भाई
ने उससे पूछा-"क्यों भाई! अपनी भाभी को नहीं
लाए ?" "भैया, वह तो विधवा हो गई हैं, उसे कैसे लेकर आता।"
"यह तुम क्या कह रहे हो पगला राम! जब मैं
जीवित हूँ तो वह कैसे विधवा हो सकती है ?"
"मुझे क्या पता भैया! मैं तो-उनकी हर बात में
आपकी आज्ञा के अनुसार हाँ ,ना का उत्तर
देता रहा हूँ।
उन्होंने कहा-" तुम बीमार हो ?" मैंने कहा-"हाँ।"
उन्होने कहा-"अधिक बीमार हो ?" मैंने कहा-"हाँ।"
उन्होंने कहा-" बचने की कोई आशा नहीं।" मैंने
कहा- "नहीं।
बस.....बस.....पगलाराम! बस" बुद्धिराम ने
माथे पर हाथ मारते हुए अपना सिर पीट लिया और
उसी समय घोड़े पर सवार होकर ससुराल पहुँचा तो
जाकर सारी बात समझाई। पगलाराम के कारण
सबको जो कष्ट हुआ था उसके लिए बुद्धिराम ने
माफी माँगी। उसे जीवित देखकर सब लोग बहुत
प्रसन्न हुए। घर के बड़े-बूढ़ों ने कहा-"बेटा "अक्ल
बड़ी या भैंस।
इस बात को सुनकर सब जोर-जोर से हँस पड़े।


राम नाम की लूट है


लाला स्वार्थी मल। यह नाम था उस दुकानदार का
जिसकी दुकान भरे बाजार में थी। इस बाजार में हर समय
साल लोगों की भारी भीड़ रहती थी हर दुकानदार ग्राहकों की प्रतीक्षा में नज़रें बिछाए रखता था।
लाला स्वार्थी मल, जैसा उनका नाम वैसा ही काम
था। वह अपने हाथ में हर समय एक माला रखते थे जैसे ही किसी ग्राहक को देखते तो जोर-ज़ोर से बोलते-
" राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। राधे श्याम, राधे -
श्याम।
उस समय स्वार्थी मल की आवाज़ भी बहुत हि ऊँची हो जाती। ग्राहकों के मन पर विचित्र सा प्रभाव
पड़ता-" राम नाम, राधे श्याम।" धार्मिक भावना से प्रेरित होकर वे स्वार्थी मल की दुकान की ओर खिंचे चले जाते|
"अंधा क्या माँगे, दो आँखे'' स्वार्थी मल को अपना धंधा करना था। राम नाम की लूट तो थी ही।
उसके साथ ग्राहकों को लूटना स्वार्थी मल का काम था ग्राहक जैसे उनकी दुकान के अंदर आता तो वह जोर से
बोल उठते-" राधे श्याम, राम, राम। धार्मिक भावना जागृत करके स्वार्थी मल जी अपना उल्लू सीधा करते
जैसे ही ग्राहक उनसे दाम पूछता हो वह बड़े ज़ोर बोलते-" बोल सियापति राम चन्द्र की जय,
बोल।" बस इसी में ग्राहक उनके जाल में फंस जाता और खुशी से मुँह माँगे दाम दे जाता।
इस प्रकार से लाला स्वार्थी मल का धंधा खूब जोर-शोर से चल रहा था।धन भी कमा रहे थे और भगवान की
पूजा भी। सारा दिन राम नाम जपते माला फैरते।
प्रभु जी उन पर प्रसन्न हो गए उन्होंने प्रसन्न होकर दर्शन दे और प्रकट होकर बोले-"स्वार्थी मल! आपकी तपस्या सफल हुई अब आप जो भी चाहो हमसे वरदान मांग सकते हो।
स्वार्थी मल के सामने तो केवल अपना ही स्वार्थ था। स्वार्थी आदमी प्रभु से धन के अतिरिक्त और क्या
मांगेगा। असल में उनके मन में तो यह बात आई थी कि जितना धन पड़ोसी कमाएं उनसे दो गुना मेरे पास आए
परन्तु जल्दी में स्थार्थी मल उल्टा ही कह गए। " हे प्रभु! मुझे मेरे पड़ौसी से..
"हाँ... हौँ... बोले भक्त संकोच मत करो। हम आपको मुह माँगा वरदान देंगे।"
"प्रभु! मेरे पड़ोसी को मुझसे भी दुगना धन देना।"
"तथास्तु ।" यह कहकर प्रभु चले गए उनके जाते ही स्वार्थी मल।
सोचने लगे कि पड़ौसी को दुगना धन। मेरी बुद्धि क्यों भ्रष्ट हो गई। मैंने क्या सोचा था और हो क्या गया ? सब कुछ उल्टा पुल्टा।" स्वार्थी मल के मन में तो पाप कूट-कूट कर भरा था। वह तो यही चाहता था कि संसार भर का धन मेरे
पास रहे और किसी को यह धन प्राप्त नहीं हो । स्वार्थी मल ने सोचा कि-" अब यदि मै प्रभु से धन
नहीं मागूँगा राधे श्याम, राम राम, करके ग्राहक को बुलाकर उनसे धन प्राप्त नहीं करूँगा तो पड़ोसी को भी
कुछ नहीं मिलेगा!" दूसरे को कुछ न मिले, भले ही उसका अपना ही नाश क्यों नहीं जाए।
स्वार्थी मल इसी विचार के कारण आपना सब कुछ बैठा। एक दिन तो ऐसा आया कि उसके घर में खाने
को कुछ न बचा। घर की एक-एक चीज़ गरीबी के कारण
बिक गई थी। बस एक पूजा का घंटा बचा था। उसकी पत्नि ने जब देखा कि अब तो भूखे मरने की नौबत आ
गई है, तो उसने सोचा क्यों न पूजा का घंटा बेच दिया जाए। इससे जो मिलेगा उससे एक दो वक्त की रोटी तो
चल जाएगी।
स्वार्थी मल को पता था कि यह घंटा ही तो राधे श्याम सीता राम का मूल मंत्र है इसी के द्वारा की गई
उपासना से तो उसने प्रभु को पाया था। अब यह घंटा बेचना....?
पत्नी को स्वार्थी मल ने अपनी भूल की पूरी कहानी सुना डाली। अब पत्नी की समझ में अपने विनाश की
पूरी कहानी आ गई थी। तभी उसने घंटे के आगे बैठक प्रभु की उपासना करते हुए कहा-"हे प्रभु! हमारी भूल
को क्षमा कर दो। हमें खाने के लिए पाँच रुपए तो दै दो। जैसे ही उस नारी ने प्रभु से प्रार्थना की तो उसी संमय पाँच का एक सिक्का उसके पास आ गिरा। उस समय पड़ोसी
के घर में भी दस का सिक्का गिरा। नारी लक्ष्मी रूप होती है। उसने अपने पति की भूल
को अच्छी तरह समझ लिया था। ईर्ष्या के कारण ही उस आदमी ने अपना सब कुछ नाश कर लिया था। एक भूल
ने पूरा परिवार नष्ट कर दिया। तभी उसकी पत्नि ने पूरी रात उस घंटे के आगे बैठकर प्रभु से प्रार्थना की और अपनी तथा अपने पति की भूल पर क्षमा माँगते हुए कहा-"प्रभु! हमें एक अच्छा सा मकान दे, खाने पीने के लिए धन दे, हमारी दुकान को पहले की भाँति चलने दे। अब हम किसी का बुरा नहीं सोचेंगे और
भला करेंगे, तो भला होगा।'
सुबह उठकर उन्होंने देखा कि उनका मकान तो एक दम
नया बना हुआ है। एक मंज़िल के ऊपर दुसरी मंज़िल बन गई है। सोने के बहुत से सिक्के घर में पड़े हैं।

स्वार्थी मल अपनी दुकान पर गया तो उसने देखा जो दुकान वह रात को खाली छोड़ गया था वह माल से भरी
पड़ी है। वह अपनी गद्दी पर बैठकर फिर से बोलने लगा- "राधे श्याम, श्याम.... सीता राम... सीता राम...
सीता राम.... राम ही राम।" उसी समय अनेक ग्राहक उसकी दुकान पर आए। वह
वह खूब माल बेच रहा था। धन का ढेर लग गया। कल तक तो उसके पास एक रुपया भी नहीं था। आज धन ही धन है।

"कर भला सो हो भला।"


अधिक भोले मते बना


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शोभराज शहर के बड़े वकीलों में से एक माने जाते थे। एक बार उनका पुराना नौकर किसी कारण वश
छोड़कर चला गया तो उन्होंने एक नया नौकर रखने की
बात सोची। इस विषय में अपने सब मित्रों को बोल
दिया कि कोई भोला-भाला, सीधा-साधा नौकर लाकर
दो जो घर के काम करता रहे ।
दुसरे ही दिन उनके मित्र एक नौकर को लेकर आ
गए। जिसका नाम भोलू था। वह नाम का भी भोलू था
और काम का भी।
वकील साहब ने उसको देखकर कहा- "देखो भोलू
राम! अपका यह धोती-कुर्ता फटा हुआ है, मैं आपको नई
वर्दी दे रहा हूँ, इसे अंदर जाकर पहन लो।"
भोलू बहुत सीधा-साधा था। उसने पैंट को तो पहली
बार देखा था, कोट के बारे में उसे कुछ पता नहीं था। यह सब वस्त्र उसके गाँव में कहाँ होते थे ।
पैंट. कोट... पगड़ी.. उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। अब मरता क्या न करता वाली बात थी।
मजबूर होकर जैसे ही उसने वस्त्र पहने तो कोट की बाँहों में अपनी टाँगें डाल दीं और पैंट को बाहों में चढ़ा लिया,
गड़ी को अंगोछा समझकर कमर में बाँध लिया। जैसे ही भोलू वस्त्र पहनकर वकील साहब के सामने आया तो वे
इतना जोर से हँसे कि उनके मुँह में पड़ी चाय भी निकल गई- हा...हा...हा...हा...हा...हा...
वकील साहब को हँसते देखकर भोलू ने डरते-डरते पूछ-"साहब! हमसे कोई भूल हुई ?"
" भूल तुमसे नहीं हमसे हुई है भोलू जो यह न जान सके कि तुम बिल्कुल बुद्धु हो।"
"बुद्धू नहीं साहब, हम तो भोलू हैं।"
"तुम भोलू हो या बुद्धु इससे क्या फर्क पड़ेगा।
जाओ पहले इस बाजू में पहनीं पैंट को टाँगों में पहनों और
टाँगों में से कोट को उतारकर कुर्ते के ऊपर पहनो ।"
थोड़ी देर के पश्चात भोलू कपड़े बदलकर आ गया
तो वकील साहब ने उससे कहा-
तुम्हें पूरे घर का और मेरे दफ्तर का ख्याल रखना होगा।
यदि कोई हमें गाली दे या बुरी बात कहे उसे किनारे लगाना
तुम्हारा ही काम रहेगा।"
"जो आपका हुक्म सरकार! भोलू तो केवल हुक्म
का गुलाम है।" यह कहते हुए भोलू ने वकील साहब की
दी हुई तलवार उठाकर गले में लटका ली।
भोलू एक अच्छा ईमानदार आज्ञाकारी सेवक था।
बकील साहब की पूरी-पूरी सेवा करता था। उनके एक
इशारे पर ही काम करने के लिए तैयार हो जाता। वकील
साहब भी भोलू के काम से बहुत प्रसन्न थे! ऐसा सेवक
तो उन्हें पहली बार मिला था, ज़ो केवल इशारा मिलते ही।
एक दिन वकील साहब के बहनोई ( जीजा) उनसे
मिलने आए तो उन्होंने आते ही बोला-"अबे ओ साले
तू इतना बड़ा हो गया है कि अपनों को भी भूल गया।"
भोलू ने जैसे ही आने वाले के मुख से गाली सुनी-
'साले', तो क्रोध से उसका खून उबल पड़ा। उसने तलवार
मयान से बाहर निकाला और उसकी गर्दन पर ऐसा वार किया किगर्दन दुसरी और जा गिरी।
अरे तुमने हमारे मालिक को साला बोला मालिक
को गाली देने वाले को हम कैसे छोड़ देगें।"
वकील साहब समझ गए थे कि इसमें भोलू का कोई
दोष नहीं। वह तो एक सीधा आदमी है। उसे मालिक की
वफादारी करनी है। आज के युग में अधिक भोला बनना
भी तो पाप है।



दुष्टो का नाश करो
 
कुवर प्रताप सिंह के मन में यह भावना पैदा हुई कि
क्षत्रिय जीवन को छोड़कर ब्राह्मण मत मे प्रवेश किया
जाए इसी विचार के आते ही वे अपने राज पुरोहित पंडित
श्री राम की शरण में गए।
"कहो कुंवर साहब, आप कैसे आए ? "
"पंडित जी! मैं आपको अपना गुरु धारण करना
चाहता हूँ अर्थात में अब ब्राह्मण मत में प्रवेश करना
चाहता हूँ।"
यह तो बड़ी प्रसन्नता की बात है कि एक राजा
हमारे धर्म में प्रवेश करे।'
पंडित जी ने कुँवर प्रताप सिंह को अपना शिष्य बना
लिया। उसी दिन से कुँवर साहब उनकी सेवा में रहने लगे।
एक दिन कुँवर साहब की पत्नी जैसे ही उनसे मिलने आई
तो पंडित जी की नज़र उस पर पड़ी - " सुन्दर.... अति सुन्दर....।" चाँद से भी अधिक सुन्दर नारी को देखकर
पंडित जी के मन में मैल आ गया। वासना की अग्नि जागृत होते ही वे अपना धर्म-कर्म भूल गए।
सुबह होते ही उन्होंने कुँवर प्रताप सिंह को अपने पास बुलाकर कहा-"देखो कुँवर साहब! अभी तो आप मेरे
अधूरे शिष्य हुए हैं ।"  "वह कैसे गुरुदेव ?"
"देखो कुँवर जी! पत्नी को हमारे शास्त्रों में अर्धागंनी
कहा गया है।
"जी हाँ
"तो फिर आप जब तक अपनी पत्नी को हमारी
सेवा में नहीं लगाते तो उस समय तक पूर्ण शिष्य नहीं
माने जाओगे। अब आप आपकी पत्नी को भी गुरु मंत्र
लेना होगा।"
"जो आपकी आज्ञा महाराज!" यह कहते हुए कुँवर
प्रताप सिंह अपनी पत्नी को लेने के लिए चले गए। उसी
दिन सुबह ही वे पत्नी को लेकर आए तो पंडित जी उसे
गुरु मंत्र देने के लिए एकान्त में ले गए। हालांकि, कुँवर
प्रताप सिंह ने उन्हें कहा भी कि-" आप जो भी मंत्र इन्हें।
देना चाहते हैं, यहीं पर दें। हम दोनों पति-पत्नी उसे स्वीकार करेंगे।" परन्तु पंडित जी ने कुँवर की बात नहीं मानी क्योंकि उनके मन में तो खोट था। वे जो कुछ भी कह रहे थे वह अपनी वासना की पूर्ति के लिए कह रहे थे।
रानी अपने पति की मजबूरी समझ रही थी। वह गुरु
मंत्र के पक्ष में नहीं थी किन्तु पति का कहना मानना भी
उसका कर्त्तव्य था। इसलिए मजबूर होकर वे पंडित जी
के साथ एकान्त में चली गई।
एकान्त में जाकर पंडित जी बोले- "देखो रानी जी!
यह भूमि आपके लिए गोकुल के समान है और आप राधा
का रूप हो। इसलिए सर्वप्रथम आप-विहार, कुरूयानी,
भोग विलास करना होगा।"
बाहर बैठे कुँवर प्रताप सिंह यह सब बातें सुन रहे थे।
उसके मन में तो पहले से ही यह शंका थी। इसलिए उनके
कान द्वार पर ही लगे हुए थे। जैसे ही उन्होंने भोग विलास
की बात सुनी तो उसी समय द्वार को पूरी शक्ति से धक्का
देकर तोड़ते हुए अंदर चले गए और जाते ही बोले-
"अहम् यमलोक समागतोहं इदमं
विधि अनेक दुष्टा हत्या।
अर्थात, मैं यमलोक से आया हूँ, मुझे यमराज जी ने
आदेश दिया है कि धरती पर रहने वाले हर दुष्ट की हत्या
करो। पापियों का नाम मिटा दो और धर्म की रक्षा करो।
यह कहते हुए कुँवर ने अपनी तलवार से उस पंडित का
सिर काटकर धरती पर फेंक दिया।



जो करता है सो भरता है


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दुलारी और छबीली दोनों विवाहित थी। पड़ोस मे
रहने कारण उन्हे एक दुसरे से प्यार भी था। इसी प्रेम
के कारण वे दोनों एक दुसरे से घरो के दु:ख सुख भी कर
लेतीं ।
दुलारी बहुत चालाक थी। वह छबीली से उसके सारे
भेद तो ले लेती परंतु अपना भेद कभी नहीं देती थी जैसे
कोई भी बात उसे छबीली आकर बताती तो वह झाट से
कह देती - "बहन! तुम मुझे क्या बताओगी यह बात तो
में पहले से जानती हूँ।"
इस प्रकार से बचारी छबीली की हर बात कटकर रह
जाती। मन ही मन में छबीली बहुत दुःखी होती परंन्तु वह बेचारी सीधी सादी औरत थी। दुलारी जैसी चतुर औरत के सामने उसकी एक न चल पाती।
एक लम्बे समय तक बेचारी छबीली दुलारी के इस  दुर्व्यवहार को सहन करती रही। अक्सर एकान्तः में उसे
बार बार यही ध्यान आता कि दुलारी से अपने इस अपमान का बदला कैसे लिया जाए ? वह उसकी किसी भी अच्छी बात की प्रशंसा करने को तैयार नहीं होती थी। वह तो बात को सुनते ही यह कह देती-"बहन! इसका मुझे
पहले से पता था।"  प्रतिशोध... बदला... बदला... वह एक दिन दुलारी
से बदला लेकर रहगी। पाप का घड़ा भरकर डूबाता है।
एक दिन की प्रतिक्षा में उसने लम्बा समय काट दिया।
फिर एक दिन वह आ ही गया, जब उसके मस्तिष्क में
बदला लेने की योजना ने जन्म लिया । इसी योजना को
लेकर वह दुलारी के घर जा पहुँची।
छबीली ने जाते ही कहा- "दुलारी बहन! आपको
पता है कि कल अमूक पर्व है। इसलिए कल पूरी , हलवा,
खीर बनानी होती है।
"हाँ तो ?" दुलारी ने पूछा।
"मैं आपको यह बताने आई हूँ कि कल तुम भी इस
पर्व को खूब अच्छे ढंग से मनाना।"
दुलारी ने पूछा-" बहन! पूरी, हलवा, खीर कैसे
बनाई जाती है। जरा तुम्हारे मुँह से मैं भी तो जानूँ ।"
"देखो बहन! सुबह उठकर स्नान करो। स्नान से पहले
घर झाड़ो। स्नान करके कोयला पीसकर अपने शरीर पर
मल लो और जूतियों का हार गले में पहन, नंगी होकर,
दूध में थोड़ा घी डालकर आटे को छान लो और नंगी
होकर पूरियाँ तलें लेकिन किसी से बात न करें। बस इस
प्रकार से यह पूरी, हलवा पर्व मनाया जाता है।'
दुलारी झट बताओगी। यह सब कुछ तो मुझे पहले से ही पता था। मैं तो सिर्फ तुम्हारी परीक्षा ले रही थी।" छबीली अपने मन में हँसकर अंदर ही अंदर बोली- "अरी! मैं तो जानती थी।
कि तू यही उत्तर देने वाली है। अब तुम्हें इस घमण्ड का
फल तो कल मिलेगा।"
उसी रात दुलारी ने अपने पति से कहा- "प्राणनाथ!
कल अमूक पर्व है इसलिए मुझे इस पर्व को मनाने के
लिए बाज़ार से अमूक... अमूक... वस्तु लाकर दो। आप
भी कल दोपहर तक घर में आ जाना। हम दोनों मिलकर
उसकी तैयारी करेंगे।
दुलारी का पति पर्व का समान लेकर आ गया तो
दुलारी खुशी-खुशी पर्व मनाने की तैयारी करने लगी।
सुबह उठकर दुलारी ने स्नान करके सारे शरीर पर
कोयला पीसकर मल लिया और फिर नंगी होकर पूरीयाँ
तलने लगी।
जैसे ही उसके पति ने अपनी पत्नी को चुड़ैल के रूप
में देखा तो क्रोध से चीखते हुए बोला- "अरी मूर्ख! तू
औरत है या कोई चूड़ैल ? तूने अपनी यह क्या हालत
बना रखी है।"
दुलारी को तो छबीली ने बोलने से मना कर रखा था।
अपने पति की बात सुनकर वह कुछ न बोली। पति को
उस पर इतना अधिक क्रोध आया कि वह उसे डंडे से
पीटने लगा।
"बस... बम... यह सब कुछ मुझे छबीली ने बताया
था। मैंने जो किया था उसका दंड मुझे मिल गया ।"
Moral-: जीवन मे कभी भी सज्जन मनुष्य का उपहास मत करो, उसे परेशान मत करो क्योकि जब सज्जन व्यक्ति उसकी सज्जनता छोड़ता है और बदला लेता है तो दुर्जन व्यक्ति कही भी मुह दिखाने के काबिल नही होता।


एक मूर्ख ऐसा भी

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एक जाट ने अपने पिता का श्राद्ध करने की पूरी
तैयारी कर ली तो उसने पंडित जी को बुलाकर हवन
कराना शुरू किया। पंडिते जी ने उस जाट को अपने सामने बैठाकर कहा-"देखो भाई! मैं आपके पिताजी की आत्मा की शान्ति के लिए आपके हाथों से जो हवन करवा रहा।
वह तभी सम्पूर्ण होगा जब आप सच्चे मन से सब कुछ
वही करेंगे जो मैं आपको कहूँगा।
अपने पिता जी की आत्मा की शान्ति के लिए वह सब कुछ करने को तैयार हूँ, जो आप कहेगे
आपकी आज्ञा का पालन मे जरूर करूगा| '
पंडित जी ने हवन शुरू कर दिया" लो पहले चुली
मे जल लो। " पंडित जी न कहा।
"लो पहले चुली में जल लो।" जाट भी एेसे ही
बोला।
"रे भाई! मैं तुमसे कह रहा हूँ।'' पंडित जी खीज़
कर बोले।
"अरे भाई। मैं तुमसे कह रहा हूँ ।" जाट भी ऐसे ही
बोला।
" भैया! कहीं तुम पागल तो नहीं हो गए।" पंडित जी
को और क्रोध आ गया। वे चिल्लाकर बोले ।
"भैया! कहीं तुम पागल तो नहीं हो गए।" जाट भी
उसी भाँति चिल्लाकर बोला।
अबकी बार तो पंडित जी का क्रोध इतना अधिक
बढ़ गया कि उन्होंने उठकर एक जोरदार चाँटा जाट के मुँह
पर मार दिया और बोले-"मैं कह रहा हूँ चूली में जल
लेकर पूजन करो ।"
जाट बुद्धि को भी क्रोध आ गया उसने भी पंडित
के मुंह पर एक जोरदार चाँटा मारकर कहा-
चूली में जल लेकर पूजन करो। "
अब की बार तो पंडित जी का क्रोध आकाश को
छूने लगा था।
मन ही मन में वे जल रहे थे और फिर उन्होंने
जाट को धक्का देकर कहा-"चल दुष्ट! तेरे बस का
पूजा पाठ तथा हवन करना नहीं है ।"
जाट ने भी पंडित को धक्का देकर कहा- "चल दुष्ट!
तेरे बस का पूजा पाठ तथा हवन करना नहीं है।"
देखते-देखते दोनों गुथम-गुथा होकर धरती पर गिर गए।
जाट तो शक्तिशाली था।
पंडित बेचारा जाट से कहाँ लड़ सकता था। वह तो उससे बचकर धोती संभालता हुआ बड़ी मुश्किल से घर पहुँचा।
उसकी पत्नी ने जैसे ही अपने पति की इतनी बुरी
हालत देखी-फटे हुए कपड़े, शरीर से खून बह रहा था।
"हाय राम! यह क्या हुआ ? किस दुष्ट ने एक ब्राह्मण
को मारकर पाप कमाया है।" पत्नी बेचारी तड़पकर बोली।
"प्रिये! उस जाट ने मेरा यह हाल किया है जिसके
पिता का श्राद्ध खाने मैं गया था।
उधर जाट की भी हालत इतनी खराब हो गई कि
उसकी पत्नी उसे देखकर तड़पकर बोली- '"अरे! क्या
हुआ? आप श्राद्ध करने गए थे या कुश्ती लड़ने। जो यह
हालत बना रखी है ।"
"भाग्यवान! अभी कुछ मत पूछो। श्राद्ध पूरा नहीं
हुआ, क्योंकि पंडित जी अपना खाना छोड़ गये हैं। अच्छा
तो यही है आप पंडित जी के घर पर ही उनका भोजन दे आओ। नहीं तो पिताजी का क्ल्याण नहीं होगा।"
"ठीक है! मैं अभी पंडित जी के घर जाकर भोजन दे।
आती हूँ।" यह कहकर जाट की पत्नी भोजन लेकर पंडित
जी के घर पहुँची। पंडित और उनकी पत्नी तो पहले से ही
क्रोध से भरे बैठे थे। जैसे ही उन्होंने जाट की पत्नी को घर
आते देखा तो, उसे पकड़ कर पीटना शुरू कर दिया।
जाट की पत्नी बेचारी इसलिए भी कुछ न बोली
क्योंकि उसने मन मे यह सोच लिया कि हो सकता है।
ब्राह्मण के घर श्राद्ध का भोजन देने के लिए आने पर
पीटकर ही भोजन लिया जाता हो।
जाट की पत्नी मार खाकर जैसे ही घर वापस आई तो
उसने आते ही जाट से कहा-" देखो जी! श्राद्ध करना
सरल है परन्तु ब्राह्मण के घर भोजन देना कठिन है । उस
ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने मिलकर जो मुझे पीटा है, उसे
मैं जीवन भर नहीं भूल सकूँगी।"
जाट हँसकर बोला-"देखो भाग्यवान! मैंने भी
पंडित जी से श्राद्ध के दिन चपत खाई है।" उसने अपना
लाल गाल पत्नी को दिखाया।" असल में यह श्राद्ध का
प्रसाद है। ब्राह्मंण द्वारा दिया प्रसाद तो भाग्यशाली लोगों
को मिलता है।"



 मूर्खो से बचो


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गाँव समयपुर के वासी उस समय बहुत चिंतित हुए
जब पुरे गाँव के पशु बीमारी का शिकार हो एक-एक कर
मरने लगे । गाँव के सीधे-साधे लोग डर के मारे तांत्रिकों,
जादूगरों की शरण में गए और रोते-रोते अपना हाल सुनाने
लगे, उनके पाँव पड़कर कहने लगे-"हमें बचाओ, हमारे
पशु मर गए तो हम बर्बाद हो जाएँगे। हमारा नाश हो जाएगा।"
तांत्रिको के गुरु ने जब इतने लोगों को रोते देखा।
तो बोले-" तुम लोग लोहे की छड़ को आग में अच्छी
तरह गर्म करो जब छड़ लाल हो जाए तो उसे पशु के शरीर
में दाग दो, ऐसा करने से पशुओं का रोग ठीक हो जाएगा।"
तांत्रिक की बात मानकर सब गाँव वासी अपने-
अपने घरों को वापस आ गए। गाँव में आकर उन्होंने
तांत्रिक के कहे अनुसार रोगी पशु के शरीर पर गर्म लाल
छड़ का दागना शुरू कर दिया। लोहे की गर्म छड़ शरीर पर
लगते ही बेचारे पशु तड़पने लगते उन बेचारों के कौन सी
जुबान थी, जो बोलकर बता सकते कि हमें इससे पीड़ा
हो रही है।
एक दिन एक पंडित जी उस गाँव में आए। रात को वे
मुखिया के घर में सोए सुबह उठकर वेदों का पाठ करने
लगे। पाठ करने के पश्चात् उन्होंने देखा और बोले-
"हाए! यह क्या ? आप लोग यह कैसा पाप कर रहे हैं ?
राम.....राम....यह बेचारा तो मर जाएगा।"
"पंडित जी! आप नहीं जानते हमें तो तांत्रिक जी ने
बताया है कि यदि पशुओं को मृत्यु से बचाना है तो उसे
गर्म करके लोहा लगाना ही होगा अन्यथा ये रोग से मर
जाएँगे।
"तुम लोग पागल हो गए हो क्या कभी ऐसे भी रोग
ठीक होते हैं ?" पंडित जी जैसे ही क्रोध में जोर से बोले
तो उन्हें खाँसी का दौर पड़ा। वे खाँसते हुए चारपाई पर
गिर गए।
गाँव वासी इकट्ठे होकर बोलने लगे -'
'लो पंडित जी
भी बीमार हो गए। इन्हें रस्सियों से बांधकर गर्म लोहा
लगाओ।'
"अरे! छोड़ो, छोड़ो मैं बीमार नहीं हूँ।'
"नहीं पंडित जी! आप बीमार हैं। यदि आपका
उपचार न हुआ तो आप मर जाएँगे। आपकी मौत का पाप तो हमें ही लगेगा।" यह कहते हुए उन्होंने पंडित जी के
शरीर पर दो गर्म सलाखें लगा दीं।
"हा....राम....मरा..।" पंडित जी के गले से एक दर्द भरी चीख निकली।
"क्यों पंडित जी! अब आपकी तबियत ठीक हुई ?
गाँव वालों ने पंडित जी से पूछा।'
पंडित जी अपने माथे पर हाथ मारते हुए बोले- है प्रभु! मैं कहाँ इन मुखों के बीच में फंस गया।"
पंडित जी ने माथे पर हाथ मारा तो गाँव वालों ने यह
समझा कि वह कह रहे माथे पर भी लगा दो।
फिर क्या था! उसी समय गर्म छड़ को पंडित जी के हैं, वह तभी माथे पर लगा दिया गया और फिर पूछने लगे-" अब तो पंडित जी ने निर्णय कर लिया कि अब मैं इनके सामने अपनी जुबान नहीं खोलूँगा। पंडित जी को चुप देखकर सब खुशी से बोले अब पंडित जी ठीक हो गए।
Moral-: पशु से चार हाथ दूर रहो, क्रोधी से दस हाथ किन्तु जहा मूर्ख हो वो गाँव हि छोड दो।



जैसे को तैसा


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पंडित रामचन्द्र जी एक लम्बे समय तक काशीजी में
जाकर वेद, शास्त्रों का अध्ययन करके ज्ञान प्राप्त करके
बहुत प्रसन्नचित्त होकर अपने गाँव वापस आ रहे थे
कि रास्ते में वे एक मूर्खों के गाँव से गुज़रे। उस गाँव के
वासियों ने उनकी ढीली धोती और बड़ा सा चन्दन का
टीका देखा तो उनके मुखिया ने आकर पूछा-
"क्या आप पंडित जी है ?"
"जी हाँ, मैं पंडित ही हूँ?"'
"आप कहाँ से आ रहे हैं ? मुखिया ने पूछा।
" मैं वेदों तथा अन्य सब धर्म ग्रन्थों का अध्ययन
करके समूचा ज्ञान प्राप्त करके काशी जी से आ रहा हूँ
और अपने घर जा रहा हूँ।
"इसका अर्थ यह हुआ कि आप बहुत बड़े ज्ञानी और
विद्वान पंडित हैं।"
"हाँ, हाँ मैं इस समय बहुत बड़ा विद्वान हूँ, ज्ञानी हूँ,
सब शास्त्रों का अर्थ कर सकता हूँ।" पंडित रामचन्द्र गर्व.
से अपना सीना चौड़ा करते।
"अच्छा, तो क्या आप हमारे गाँव के लट्ठा पंडित के
साथ शास्त्र अर्थ करेंगे ?"
"क्यों नहीं, क्यों नहीं। मैं तो संसार के किसी भी
पंडित से शास्त्र अर्थ करने के लिए तैयार हूँ। पूरे पच्चीस
वर्ष तक मैंने काशीजी में शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त की है।"
"पंडित जी! हमारे लट्ठा पंडित इस शर्त पर आपसे
ज्ञान वार्ता करेंगे कि यदि उस प्रतियोगिता में आप जीत
गए तो हमारे लट्ठा पंडित की सब धार्मिक पुस्तकें पोथी
पत्रा, आप ले जाएँगें और यदि लट्टा पंडित जीते तो
आपको अपनी सब पुस्तकें उन्हें देनी पड़ेंगी।"
"हाँ, हाँ, मुझे आपकी यह शर्त मंजूर है। मैं आपके
लट्ठा पंडित से ज्ञान प्रतियोगिता करने को तैयार हूँ।"
उसी समय मूर्ख नगर के वासी अपने लट्टा पंडित को
हुए बोले।
तैयार करके रामचन्द्र के सामने लाए तो उन्होंने सबसे
पहले पंडित जी को नमस्कार किया। लट्ठा पंडित हँसकर
दोनों हाथ जोड़ते हुए बोले-
" नमस्कार..... ठमस्कार..... प्रतिकार.....कार..
कार..... कार.....नमस्कार।
काशी वाले पंडित जी चुप होकर उस पंडित के मुख
की ओर देखने लगे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि
उसे क्या उत्तर दें।
तब मूर्खों के लट्ठा पंडित बोले-"आप काशी जी से
पढ़कर आए हैं तो पहले इस श्लोक का अर्थ बताओ-
डम.....डम..डैया....डैया...
मक्खन खैंया खैंया....
"यह तो कोई बात नहीं बनती'
"बात तो बहुत बनती है। यूँ कहो कि आपको
अर्थ नहीं आता।
अब आप अपनी हार मान लो।आप हार
गए लाओ अपनी हा.....हा....हा. पोथियाँ.
ग्रन्थ मुझे दे दो।"
"आप हार गए, हार गए।" सब लोगों ने जैसे शोर
मचाया-" हार गए, हार गए", तो पंडित रामचन्द्र को
अपनी पुस्तक देकर वहाँ से भागना पड़ा।
घर पहुँचे तो उनके मोटी-बुद्धि वाले भाई ने उनकी
यह हालत देखकर अंदाज़ा लगा लिया कि उनका भाई
बहुत उदास और दुःखी है। उसने अपने भाई से इस दुःख
का कारण पूछा तो पंडित जी ने मृुर्ख गाँव वाली सारी
घटना सुना दी।
मोटी बुद्धि वाला भाई समझ गया कि उन मूर्खों के भी
साथ ज्ञान से नहीं उन्हीं की भाषा में बात करके जीता जा सकता है।
तभी उसने अपने भाई को साथ लिया माथे पर
बड़ा सा चन्दन का टीका, सफेद धोती, सफेद कुर्ता पहन
कर मूर्ख नगर जा पहुँचा।
पंडित जी को गाँव में आते देखकर गाँव वालों ने
फिर वही बात उस पंडित से भी कही-"लट्टा पंडित से
प्रतियोगिता।" वह तो पहले से ही इस बात के लिए
तैयार होकर आया था। पंडित ज्ञान चन्द्र के साथ भी वही
शर्त रखी गई कि जो हारेगा वह अपनी शास्त्र पोथियाँ
जीतने वाले को दे देगा।
एक बार फिर दोनों पंडित आमने-सामने आए तो
लट्ठा पंडित ने आते ही कहा-
"नमस्कार.... ठमस्कार..
पटकार..... छटकार.....
गमस्कार..... कार ही कार..
पंडित ज्ञान चन्द्र बोले-'"नमस्कार... त्रितिकार.. फटीकार.... कार ही.....का...कार..... कार.....
नमस्कार होने के पश्चात दोनों पंडित अपनी-अपनी
पुस्तकें लेकर पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए।
उनके चारों ओर गाँव वासी घेरा डालकर बैठे थे।
"ख.....ख...खैया..खैया....खैया..खैया....
ज्ञान पंडित बोले-"अरे भाई पहले से ही खैया कहाँ
से भईया पहले ज्योति जलैया.... पू जा पाठ
कैईया..भगवान को भोग लगईया....
लट्टा पंडित, ज्ञान पंडित की वाणी सुनकर एक दम
चुप हो गए।
अरे बोलो..बोलो..कुछ तो बोलो और नहीं राम राम हि बोलो...क्यो लट्ठा पंडित? अब अपनी सब पुस्तक यथा नह शीघ्र वापस ला दो हम अपने घर जाएंगे।"
"पंडित ज्ञान चन्द्र जी, आप मेरे गुरू निकले । मैं तो
मूर्ख गाँव का मूर्ख था, परन्तु आप तो मेरे भी गुरू महामूर्ख
निकले। इसे कहते हैं-
"जैसे को तैसा मिला "


कठोरता से संवारा शिष्य का जीवन
 
बात उस समय की है जब उज्जैन के राजकुमार
सातवाहन गुरु शिवदास के आश्रम में अध्ययनरत
थे। सातवाहन अनेक बुरी आदतों का शिकार था।शिवदास
ने जब यह देखा. तो सबसे पहले इन्हें छुड़ाने का प्रयास
किया. क्योंकि सातवाहन भविष्य का राजा था।
राजा यदि आदर्श होगा तो प्रजा में अच्छे संस्कार रहेंगे। 'यथा राजा तथा प्रजा' के सिद्धांत को ध्यान में रखकर शिवदास ने सातवाहन के साथ सख्ती का व्यवहार किया। उसकी बुरी आदतों के लिए उसे अनेक सामान्य विद्यार्थियों की तरह दंडित किया।
अंततः शिवदास के प्रयास सफल रहे।
और राजकुमार ने अपनी बुरी आदतों का त्याग कर दिया।
उचित समय आने पर सातवाहन उज्जैन के राजसिंहासन पर बैठे। किसी कारणवश तब तक गुरु शिवदास की स्थिति निर्धनता के कारण बहुत दयनीय हो गई थी।
अपना गुजारा,चलाने के लिए उन्हें भिक्षावृत्ति करनी पड़ती थी। एक दिन वे भिक्षा मांगते हुए राजमहल के सामने पहुंचे। संयोग से राजा सातवाहन ने उन्हें देख लिया।
अपने गुरु को याचक के रूप में देखकर राजा ने कहा, 'आपने मुझे इतना अधिक दडित किया है, कई बार तो पीटा भी है कि अब आपकी इस दुर्दशा पर मुझे तनिक भी दया नहीं आ रही है।'
राजा की बात सुनकर शिवदास बोले, 'लेकिन मुझे यह देखकर अपार हर्ष है कि तुम्हें सही मार्ग दिखाकर व अच्छी शिक्षा देने के कारण आज तुम्हारी प्रजा सुखी व समृद्ध है अकेला मैं भिक्षुक बचा हूँ।
गुरु के उत्तर ने सातवाहन को शर्मिदा किया। उसने गुरु से क्षमा मांगकर तत्काल उनके जीवन यापन हेतु सम्मानजनक प्रबंध कर दिया। योग्य गुरु, शिष्य का जीवन संवार देता है। ऐसे गुरु का स्नेह और देड, दोनों सिर झुकाकर स्वीकार करना चाहिए।


 
 
जल्दी बुलाकर लाओ

 
बादशाह अकबर एक सुबह उठते ही अपनी दाढ़ी
खुजलाते हुए बोले, "अरे, कोई है?"'
तुरन्त एक सेवक हाजिर हुआ।
उसे देखते ही बादशाह बोले, "जाओ, जल्दी बुलाकर
लाओ, फौरन हाजिर करो।"
सेवक की समझ में कुछ नहीं आया कि किसे बुलाकर
लाए, किसे हाजिर करे? बादशाह से पलटकर सवाल करने
की तो उसकी हिम्मत ही नहीं थी।
उस सेवक ने यह बात दूसरे सेवक को बताई। दूसरे ने
तीसरे को और तीसरे ने चौथे को। इस तरह सभी सेवक यह
बात जान गए और सभी उलझन में पड़ गए कि किसे
बुलाकर लाएँ, किसे हाजिर करें।
बीरबल सुबह घूमने निकले थे उन्होंने बादशाह के निजी
सेवकों को भाग-दौड़ करते देखा तो समझ गए कि जरूर
बादशाह ने कोई अनोखा काम बता दिया होगा, जो इनकी
समझ से बाहर है। उन्होंने एक सेवक को बुलाकर पूछा,
"क्या बात है? यह भाग-दौड़ किसलिए हो रही है?"
सेवक ने बीरबल को सारी बात बताई, '"बीरबल जी!
हमारी रक्षा करें। हम समझ नहीं पा रहे हैं कि किसे बुलाना है।
अगर जल्दी बुलाकर नहीं ले गए, तो हम पर आफत आ
जाएगी।"
बीरबल ने पूछा, "यह बताओ कि हुक्म देते समय

बादशाह क्या कर रहे थे?
बादशाह का निजी सेवक, जिसे हुक्म मिला था, उसे
बीरबल के सामने हाजिर किया तो उसने बताया, "जिस
समय मुझे तलब किया, उस समय तो बिस्तर पर बैठे अपनी
दाढ़ी खुजला रहे थे।"
बीरबल तुरन्त सारी बात समझ गए और उनके होंठों पर
मुस्कान उभर आई। फिर उन्होंने उस सेवक से कहा, "तुम
हज्जाम को ले जाओ।"
सेवक हज्जाम को बुला लाया और उसे बादशाह के
सामने हाजिर कर दिया।
बादशाह सोचने लगे,"मैंने इसे यह तो बताया ही नहीं था
कि किसे बुलाकर लाना है। फिर यह हज्जाम को लेकर कैसे
हाजिर हो गया?"
बादशाह ने सेवक से पूछा,"सच बताओ। हज्जाम को
तुम अपने मन से लाए हो या किसी ने उसे ले आने का सझाव
दिया था?"
सेवक घबरा गया, लेकिन बताए बिना भी तो छुटकारा
नहीं था। बोला, "बीरबल ने सुझाव दिया था, जहाँपनाह!"
बादशाह बीरबल की बुद्धि पर खुश हो गाए।


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