मेहनत का फल



बहुत पहले की बात है, एक गांव में
भोला नाम का एक गरीब आदमी रहता था।
उसके पास थोड़ी बहुत जमीन थी पर वह
खेती व अन्य काम-धंधा कुछ भी नहीं करता
था। उसने एक भैंस पाल रखी थी। उसी को
चराता और सुबह-शाम उसका दूध निकाल
कर बेच देता था। इस तरह से अपनी जीवन
यापन करता था।
एक बार वह कहीं जा रहा था। भोला ने
उनके चरण स्पर्श किये और उनसे पूछा-
गुरुजी आप कहाँ से पधार रहे हैं? गुरुजी ने
कहा कि वत्स हम बहुत दूर से आ रहे हैं। हमें
बहुत भूख लग रही है, और हम भोजन की
तलाश में है। भोला ने कहा कि गुरुजी दिन तो
अस्त हो ही गया, रात होने वाली है इसलिए
आप दोनों रात्रि विश्राम मेरे यहाँ करें। यह
सुनकर गुरू-शिष्य दोनों प्रसन्न होकर उसके
साथ घर चल दिए। घर जाकर भोला ने भैंस का दूध
निकाला और दोनों अतिथियों को गरम-गरम
दूध पिलाया, उन्हें भोजन करा कर सोने के
लिए बिस्तर लगा दिए।
गुरुजी ने रात में भोला से पूछा-
"भोला तुमने केवल एक भैंस ही पाल रखी है।
तुम्हारे पास तो जमीन है, खेती भी है। तुम
खेती क्यों नही करते?"
भोला ने कहा- "गुरुजी खेती में धूप
बहुत लगती है, भयंकर ठण्ड में खेत पर जाना
पड़ता है। बरसात में पानी बहुत गिरता है,
इतनी मेहनत कौन करें। मैं तो अपनी इस एक भैंस के सहारे ही अपना गुजर-बसर कर लेता हू"
गुरुजी ने कहा- "भोला अगर तुम परिश्रम करोगे तो तुम्हारी बहुत उन्नति होगी।
अधिक रात्रि हो जाने पर सभी सो गए।
सुबह जब भोला की नींद खुली तो देखा कि गुरु और शिष्य दोनों नहीं है।
दूध दुहने भैस के पास गया तो भैंस वहाँ नहीं थी। उसे किसी ने खूटे से खोल कर भगा दिया था। भोलाको बहुत दुःख हुआ। किन्तु उसने हिम्मत नहीं हारी। अब वह कठिन परिश्रम करने लगा। स्वंय खेतों में हाक जोत कर फसल पैदा करने लगा।
कई वर्षों के बाद एक बार फिर वहीं गुरू और शिष्य उसी गाँव में आए।
उन्होंने गांव वालों से पूछा- ''अरे पहले यहाँ एक एक झोपड़ी थी वह नहीं दिख रही है? और उसमें रहने वाले ये सब कहाँ गए?
इतने में ही भोला वहाँ आ गया। उसने गुरु शिष्य दोनों को पहचान लिया।
वह दोनों के चरणों में गिर गया। उसने कहा- "गुरुजी मैं ही भोला हूँ'' आपके ही आशीर्वाद से आज झोंपड़ी की जगह पर यह पक्का मकान बना है। कई गायें व भैंसे है। बढ़िया दुकान है, घर में टी.वी., फ्रिज, मोटर-सायकल, ट्रेक्टर-ट्राली है।
कई नौकर है। आप दोनों तो मेरे लिए भगवान हैं। आपको बहुत-बहुत
धन्यवाद।
भोला ने उन दोनों का अच्छा स्वागत कर बढिया सेवा की और अच्छी
दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।
आगर-मालवा (म.प्र.)

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