गर्भ संस्कार की आवधारणा




काशी हिंदू विवि के आयुर्वेद विज्ञान
विभाग ने गर्भ संस्कार शिक्षा देने की
शुरूआत की है। कैम्ब्रिज विवि भी गर्भ
संस्कार की आवधारणा को मान चुका है। भारत में ये
प्रयोग जमशेदपुर के 'फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड
गाइनेकोलॉजिकल सोसाइटी', इंदौर में अभिभावक
प्रशिक्षण संस्थान और हिंदी विवि भोपाल में शुरू हो चुके हैं।
इन संस्थानों में गर्भस्थ शिशु को तकनीक के जरिए
गणित और विज्ञान जैसे जटिल विषयों में दक्ष करने के
उद्देश्य से यह शिक्षा दी जा रही है। इसे 'अद्भुत मातृत्व'
की संज्ञा दी गई है। अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का गर्भ में रहते
चक्रव्यूह भेदने की शिक्षा लेने, लेकिन बाहर निकलने
की विधि सुनने के समय मां का सो जाने से तात्पर्य है
कि मां की कोख से कोई संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करके नहीं
आता। सारा ज्ञान जीवन की जटिलताओं से जूझते हुए
ही सीखा जा सकता है।
उपनिषदों में एक अन्य कथा भी गर्भ शिक्षा से जुड़ी
है। ऋषि उद्दालक की पुत्री सुजाता का विवाह शिष्य
कहोड़ से हुआ था। सुजाता के गर्भवती होने के बाद
कहोड़ श्लोकों का गलत पाठ करते तो शिशु टोकता,
'पिताजी आप गलत वेद पाठ कर रहे हैं।' पिता क्रोधित
होकर बोलते, 'तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है,
इसलिए आठ स्थानों से वक्रीय (टेढ़ा) पैदा होगा।' पैदा
होने पर अष्टावक्र आठ स्थान से टेढ़े थे, इसी कारण
उनका यह नाम पड़ा।
वैज्ञानिक दावा करते हैं कि गर्भ के तीसरे महीने से
शिशु में शिक्षा या संस्कार आत्मसात करने की क्षमता
विकसित होने लगती है। शिशु की मस्तिष्क कोशिकाएं,
आंखें और श्रवण-इंद्रियां विकसित हो जाती हैं। विजुअल आई पाथ वे स्टीम्युलेशन' तकनीक के जरिए शिशु के मस्तिष्क और आंख के बीच की सुप्त अल्पविकसित रक्त-शिराओं में समन्वय स्थापित किया जाता है।
लेजर किरणों के जरिए वाष्पित ऊर्जा के संचार से दिमाग, आंख और कान के मार्ग में आने वाली सुप्त पड़ी कोशिकाएं जागृत की जाती हैं और शिशु दृश्यों को समझने लगता है।
आवश्यकता से अधिक ऊर्जा शिशु के दिमाग, दृष्टि
और सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है यानी
हठपूर्वक दी गई शिक्षा अनर्थकारी भी हो सकती है।

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